बसँत

चिड़िया, शाख और सांप

बसंत आया

– गया

अब चिड़िया आएगी

पेड़ झूमा

शाख नाची

और सांप मुटियाया

चिंघाड़ा समाज

बेबस फूलों की महक में डूबा बसंत

निराश हो गया

कुम्हलाया मौसम

चिड़िया नहीं आई

गरीब की बेटी जैसे

गिलहरी रोई

दूर से गूंजा

चुन लो गठबंधन

चिड़िया

शाख

और सांप

अकाल-सुकाल की मानिंद

पांच साल में फिर आऊंगा

ये स्वर बसंत का है

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