खुशी नाल उस बँदे जिँदगी गुजार दित्ती

खुशी नाल
जिन्नी वारी
उस
गल करन दी
कोशिश कित्ती
खुशियाँ अखियाँ फिरा लित्ती
किसी राती
खुशी आई बी ताँ
नसीब
उस दियाँ अखियाँ दी
निँदर फिर गई
हौर
सुपने विच भी
उसनूँ खुशी
मिल नीँ सकी
इस तरहाँ
खुशी मिलन दी
उम्मीद नाल
उस बँदे
जिँदगी
गुजार दित्ती

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कविता दिवस : खामोशी का गीत = “कविता”

कविता दिवस : खामोशी गाती
हर रोज रूप बदल कर आता
कोलाहल कहता कुछ नहीँ खुद किसी से
पर
हर किसी से बस अपने बारे मेँ कहलाता
… ध्वनि से श्रव्य और दृश्य से अनुभूत काव्य श्रृँगार का प्रादुर्भाव निश्चय ही किसी काल मेँ 21 मार्च को ही हुआ होगा। यह दिवस प्रकृति का प्रिय जो है। हरी चुनरी से सजी इठलाती धरा पर नवपल्लव, अधखिली कलियाँ, कुलाँचे भरते मृग-शावक, मँडराते भँवरे, पहाड़ोँ पर बर्फ का पिघलना और धूप की बजाय छाँव मेँ सुस्ताते वन्यजीवोँ के गुँजन से जो अनुभूति हुई उसे आदि कवि खामोशी का गीत = “कविता” की सँज्ञा न देता तो “अहसास” प्राण विहीन हो पाषाण युग से आगे का यात्री नहीँ बन पाता। सँवेदनाएँ पाषाण रह जाती। प्रकृति कविता न गाती तो मानवता कैसे मुस्काती !

712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष

जब ब्राह्मण राजा दाहर युद्ध के मैदान मेँ था तब सिँध के क्या हालात थे…? अलोर सिँध का किला 1300 साल बीतने के बाद भी अपने आप मेँ कई रहस्य समाए है। क्या किले मेँ सुरँग भी है? हिँगलाज माता व नृसिँह जी का मँदिर है। सिँधु सँस्कृति मेँ नारी को महान दर्जा प्राप्त है। नारीशक्ति ने अपने राष्ट्र के लिए दुश्मन का सामना कैसे किया कि आज भी उसे याद कर सलाम किया जाता है। पूजा जाता है। इन सब के साथ 712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष राजमाता सुहँदी महारानी लाड़ी माई पदमा का द्वन्द्व शामिल है Sindhi Novel Kooch Ain Shikast मेँ।लोकार्पण जल्द।

अंतर्मन

मायाजाल का खिलौना बना अंतर्मन

मुक्त होने को तपस्यारत

रंगमहल में शतरंज की बिसात

मोहरे सिर उठाये निहारते

पैदल सहमे हुए

हाथी-घोड़े अड़े हुए

वजीर असमंजस में

राजा रंगरेलियों में

मन के हजार कोनों में

दुबका हुआ अंतर्मन

जीवन सँवारता साहित्य सुना – भेड़िया आया, रँगा सियार डरने और डराने वाले…

जीवन सँवारता साहित्य सुना – भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को।आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै भाया…
जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे “मँत्र” भरे पड़े हैँ।

चारों ओर रेत ही रेत

चारों ओर रेत ही रेत

कभी छाते बादल

बरसते और…
थमती रेत

बिजली चमकती
मसले बनते

गर्जना होती
द्वन्द्व मचता

बिखरे स्वप्न इकट्ठा होते

गांठ बंधती

कारीगर रोंधते जमीन

खोदते विगत

नींव हिलती

इमारत ढहती

चलती आंधी

रह जाती

चारों ओर रेत ही रेत

फिर तिरने लगे वे पल… बहुत पहले अँकित पँक्तियाँ उभर आई फिर आज …

हर दिन सर्दियों की दोपहर मेँ
बहुत सी चिडियाँ , दो गिलहरियाँ और …
कुछ कौवे ….
दीवार के सहारे लगे गमलोँ के पास….
अठखेलियाँ करने आ जाते थे …
अब…
मकान ऊँचे हो गए !
रहा नहीं अब ….
दीवार के पास उतरने वाली धूप का …
गर्म … नर्म … वो प्यारा अहसास … !