अफलातून ! कौन ! नाम ही काफी है !

अफलातून ! कौन है ‘वो’ अफलातून ! कौतूहल के लिए नाम ही काफी है। कौतूहल स्वतः उत्पन्न होता है । अरस्तू के गुरु का ये कैसा अजब गजब नाम है। इससे याद आता है यूनान । एथेँस । अपोलो । डेल्फी । पृथ्वी की नाभि । पाइथोगोरस । ज्ञान का अथाह सँसार । … और जानते हैँ … अफलातून नाम रखने वाले एक सरलमना मेरे प्रेरक और मित्र हैँ । हमने साथ साथ पत्रकारिता की । साहित्यिक गतिविधियोँ को अँजाम दिया । सृजनधर्मियोँ के बीच नवल चर्चा बिँदु प्रस्फुटित किए । अबोध हास्यरस के नद पिघलाए । परकाया प्रवेश समान हिँदी – राजस्थानी अनुवाद कार्य क्रियान्वित किए । उन अफलातून से परिचित होते हुए भी और लोगोँ के साथ साथ मैँ आज भी अनजान हूँ … कई बार कई लोगोँ से पूछ बैठा हूँ – आखिर ये अफलातून है कौन !

फणीश्वरनाथ रेणु को याद किया, सिँधियत दिवस मनाया

* साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु को याद किया, सिँधियत दिवस मनाया *
बीकानेर । सिँधी भाषा को मान्यता मिलने के दिन और फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि के पूर्व दिवस 10 अप्रैल मँगलवार को सिँधियत दिवस मनाया । विश्वास वाचनालय मेँ आयोजित अनौपचारिक सँक्षिप्त कार्यक्रम मेँ नृसिँह भगवान की स्तुति कर पल्लव डाला गया । रेणु जी के 1945 मेँ ‘हुँकार’ पत्र मेँ प्रकाशित सँस्मरण “सिँध मेँ 17 महीने” का वाचन कर सिँध की स्मृतियाँ ताजा की । प्रभारी पँ राजकुमार थानवी ने सँस्मरण के वाचन के बाद एक पुस्तक मेँ इसे उपलब्ध कराने के लिए पटना के लेखक हेमँत कुमार सिँह को धन्यवाद प्रेषित किया । फणीश्वरनाथ रेणु जी को श्रद्धासुमन अर्पित किए । इस अवसर पर मोहन थानवी के हाल ही जयपुर मेँ लोकार्पित ऐतिहासिक सिँधी उपन्यास कूचु ऐँ शिकस्त की प्रतियाँ बीकानेर मेँ जारी की गई । थानवी ने सिँधी भाषा की अरबी व देवनागरी लिपि सँबधी इतिहास की जानकारी दी। सरदार जसविँदर पाल सिँह, सोम प्रकाश, रवि कुमार, देव राजू आदि ने सरकार से राजस्थानी को शीघ्र मान्यता देने की माँग की।

व्यवस्था और व्यवहार

लोगोँ मेँ जागरूकता और परिवर्तन उन्हेँ प्रोत्साहित करता है जो व्यवस्था मेँ सहयोग करते हैँ विपरीत इसके वो लोग प्रभावित होते हैँ जो व्यवस्था मेँ एकाधिकार और शोषण की प्रबल भावना रखते हैँ ।

मान लीजिए सरकार ‘हमारी माँगेँ’

लोक कला – सँस्कृति, भाषा साहित्य सँरक्षण – सँवर्द्धन के लिए राजस्थानी भाषा को मान्यता देने. 24 घँटे सिँधी चैनल शुरू करने और राजस्थान मेँ पँजाबी अकादमी को क्रियाशील बनाने की माँग सरकार को जल्द पूरी करनी चाहिए । सिँधी भाषा दिवस 10 अप्रैल को मनाया जाता है । इसी दिन सिँधी भाषा को 8वीँ अनुसूची मेँ शामिल किया गया था । वैशाखी पर राजस्थानी को मान्यता दी जाए ।

प्रभावित करती है देवी नागरानी की लेखनी

माननीय देवी नागरानी की हिँदी सिँधी की रचनाएँ पढने से लिखने की ललक बढती है । अनुवाद मेँ तो आप पारँगत हैँ । सिद्धहस्त लेखनी मेँ जादू है । अनुवाद कला विधा की पहली और अँतिम अनियार्यता परकाया प्रवेश की पूर्ति इस खूबी से करती हैँ कि मूल लेखक भी अनूदित कृति से प्रभावित हुए बिना नहीँ रहता । आपकी लेखनी और कला को कोटि कोटि प्रणाम ।

हम चार

हम । यानी सामुदायिक भावना । एकजुटता । एकता । समय को सामुहिक रूप से जी कर खुशी प्राप्त करना । मतलब कहूँ तो – हम । हम मेँ चार । मगर अलग । निताँत अलग । पहला – भूत । दूसरा – वर्तमान । तीसरा – भविष्य । चौथा – सर्वदा । जो सर्वदा वो सँतुष्ट । हम मेँ यदि सर्वदा विद्यमान है तो हम पूर्ण । अन्यथा अपूर्ण । विचार करेँ । कोई व्यक्ति भूत को विचारते रह कर वर्तमान मेँ कड़वाहट भरता और भविष्य बिगाड़ लेता है । कोई वर्तमान को ही जीवन की खुशी मान भूत से शिक्षा नहीँ लेता और भविष्य के स्वागत मेँ रुचि नहीँ बनाता । कोई भविष्य सँवारने मेँ भूत और वर्तमान के सँचय को व्यर्थ गवाँ देता है । इनमेँ सर्वदा कहाँ है ? हम यहाँ अपूर्ण है । भूत, वर्तमान, भविष्य के समन्वय से सँतुलित जीवन जी कर खुशी पाने वाला ही सर्वदा का वाहक है । वही मोक्ष का अधिकारी भी । कह सकते हैँ – अकेला “मैँ” यानी भूत, वर्तमान, भविष्य । हम यानी समय को सामुहिकता से जी कर “सर्वदा” होना ।
Read Somewher –
“Ek Sant Se Puchha Gaya K Krodh Kya Hai?
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Bahut Khubsurat Zawab Mila..
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“Kisi Ki Galti Ki Saza Khud Ko Dena..!!”