केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ‘स्वाति तिरुनाल’ रै नाम सूं कविता करता हा…

धन्य है बै मायड़ भासा रा हितैसी जिका तन-मन-धन सूं इण रै प्रति समर्पित है, भगती में लीन है।
भगती सूं काम करता अ‘र उण रै प्रति समर्पण राखता निस्चै ही अपानै सफलता मिलैली। भगती रो परताप अपां सगळा जाणा हा। – भाषा साहित्य मिनख-मिनख नै जोड़ै, देस री एकता रै वास्तै भासा अेक जरियो बणै, आ बात कैई जा सकै। जियां’क विदेसियां रै आक्रमण सूं जद आपणै देस रो जन, या कैवां कै म्है लोग जद त्रस्त हुईग्या हा, बीं बखत साहित्यकार जगत जिकी एकता रो दरसण आपणी कलम सूं करायो, बा बात कोई दो-चार सताब्दियां में भी भूलीजणी आसान कोनी। बीं बखत किरसण भगवान रो बखान बिपती रै दिनां सूं छुटकारो पावण रो एक उपाय जियां लागै कैवां तो सायद गलत कोनी समझो जावैळा। सूरदास उण बगत स्री किरसनजी री लीलावां नै कागद माथै उकेर जीव-जगत नै जीवण रो नूवांे अंदाज दिरायो। राजपाट नै एक तरफां राख इब्राहीम मियां जद रसखान बण सकै तो समझणोें कै ओ भगती रो ई ज बखान है।
केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ‘स्वाति तिरुनाल’ रै नाम सूं कविता करता हा।  महारास्टर रा संत ज्ञानेस्वर, नामदेव अ‘र सिन्धु प्रदेस  रा श्रीलालजी भी कवि ही नीं किरसनजी री लीलावां नै भगतां रै साम्है राखणियां भी मानीजे क्यों कै इयां सूं पैली लोगां रै साम्है भगती रा  दूजा सबद आयौड़ा हा। पंजाब रा गुरुनानकदेवजी नै कुण नीं बांच्यो है, रनजीतसिंह रै दरबार में कवियां रो जित्तो मान हो बीनै भी साहित्य जगत जाणै ही है। गुजरात रा भालण, नरसी मेहता, दयाराम आज भी आपणै आखरां री गूंज बणाय राखी है। आ बात भूलीजण जिसी कोनी कै कोई अेक भासा में रचयोड़ी रचना नै बांचणै रै वास्ते कितराई विद्वान आपरी भासा रै अलावा दूजी भासावां सीख्या। बंगाल रा कवि यसोराज खांन, मिथिला रा विद्यापति, आसाम रा संकरदेव, माधवदेव रा सबद राजस्थान रो गौरव मीरां रै सबदां स्यूं कम गूंज कोनी मचायोड़ा है। राजस्थान रा राजा-महाराजा ताईं ईं भगती री नद्यां मांय बहियोड़ा हा, जैपुर रा ब्रजनिधि संतागढ़ रा नागरीदास, जोधपुर रा जसवंतसिंह, झालावाड़ रा सुधाकर अ‘र भरतपुर रा बलदेवसिंह जिसा कित्ताई नाम गिणाया जाय सकै।
( राजस्थानी उपन्यास कुसुम संतो… सू चुन्योडा रा अंस ) )

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शेर बनो… शुभ मँगल कामनाएँ

शेर बनो । शुभ मँगल कामनाएँ ।
आज कोई आपका हक मार ले तो शेर बन जाओ । जयपुर मेँ 5 साल पहले बिताए एक दिन मेँ एक विद्वजन की दी हुई सीख भूल नहीँ सकता । उनकी इस सीख की फिलासफी समझी तो आत्मानँदी बन गया । शेर जँगल मेँ अकेला होता है , ये जानते हुए भी अपने हक के लिए शेर बनना बुरी बात नहीँ । फिर… सामाजिकता छोड़ कोई जब आपका हक मारने से शर्म नहीँ करता तो अपना हक हासिल करने के लिए कैसी शर्म ! जैसे शेर अपने शिकार के चिथड़े उड़ा देता है और प्रतिद्वँद्वी के लिए कुछ नहीँ छोड़ता वैसे ही अपना काम पूरी ताकत और निष्ठा से करके अपने हक पर दूसरोँ को दृष्टि डालने का भी अवसर नहीँ देना चाहिए । आत्म आनँद प्राप्त करो । आत्मानँदी बनो । शेर बनो । शुभ मँगल कामनाएँ ।

माँ

माँ के चरणोँ मेँ मिला स्वर्ग
माँ के वरदहस्त से हर्ष
माँ से पाया धरा ने धैर्य
माँ से देवोँ ने ली किलकारी
माँ ही देवी जगत जननी
माँ बिन नहीँ स्वर्ग मेँ सुख
माँ बिन नहीँ हर्ष का स्पर्श
माँ का आशीष ही गर्व
माँ का आँचल ही सुख
माँ ही आन बान और शान
माँ ही देती ज्ञान
माँ गुरु माँ ही भगवान
माँ ही जीवन की मुस्कान
( मोहन थानवी ,13 may 2012 )