क्यों होता है ऐसा… !!!

क्यों होता है ऐसा… !!!
रातों को जाग कर… अंधेरे में नाचते झिलमिलाते झिंगुरों के गीतों पर झूमते… मनोमस्तिष्क में उभरते रंगबिरंगे शब्दों को खुद ब खुद आकार मिलता जाता है… दिनकर की आहट पर नभचरों की चहचहाहट सुनता हूं तो कागज पर उकेरे शब्द स्वागत करते हैं। … क्यों होता है ऐसा… !!!

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श्रम को मत शर्मसार करो

श्रम दिवस है
श्रम को मत शर्मसार करो 
श्रमिक तोड़ता है चट्टानें और घमंडी का घमंड
श्रमिकों की संवेदनाओं से मत खेलो
हथेलियों पर उभरी लकीरों से नहीं बनते मैदान
पहाड़ों को काटने वाली लकीरविहीन हथेलियों को पहचानो
जान लो क्यों है श्रमिक की ऐड़ियों में बिवाई
श्रम को मत शर्मसार करो

मां मां

मां के चरणों में मिला स्वर्ग
मां के वरदहस्त से हर्ष
मां से पाया धरा ने धैर्य
मां से देवों ने ली किलकारी
मां ही देवी जगत जननी
मां बिन नहीं स्वर्ग में सुख
मां बिन नहीं हर्ष का स्पर्श
मां का आशीष ही गर्व
मां का आंचल ही सुख
मां ही आन बान और शान
मां ही देती ज्ञान
मां गुरु मां ही भगवान
मां ही जीवन की मुस्कान
– मोहन थानवी 13 मई 2012

सच ये ही सच

पहाड़ रचयिता ने रचे तो ऊंट भी हैं। समन्दर की लहरों से अटखेलियां करती ह्वेल को भी प्राण दिए हैं। हाथी के लिए मण और चींटी को कण से तृप्त होने का सामर्थ्य देने वाला भी वही रचनाकार है। जगत की असंख्य और अकल्पनीय रचनाओं का साक्षात कराने वाला ही तो है वो। जानता हूं ; यही वजह है कि धैर्य मेरा संगी – साथी है । संतोष जुदा नहीं होता। दु:ख – चिंता जरूर सांसारिक होने का भान कराते हैं मगर जल्दी ही फिर उमंग – तरंग में प्रवाह का अवसर भी मेरी मुट्ठियों में होता है। ऐसे में भला रचयिता से शिकायत कैसे करूं? किसीकी भी क्योंकर करूं।